दिल, दिमाग व फेफड़ों के साथ कोरोना आंखों पर भी कहर
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दिल, दिमाग व फेफड़ों के साथ कोरोना आंखों पर भी कहर ढा रहा है। लंबे समय से घरों में रह रहे सामान्य लोग भी आंखों से संबंधित परेशानियों से जूझ रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि आंखों के रोगियों की संख्या पिछले साल के मुकाबले दो गुना बढ़ी है। कोरोना को हरा चुके मरीज जहां कमजोरी की वजह से इसके शिकार हो रहे हैं, वहीं सामान्य लोगों में लैपटॉप, स्मार्ट फोन पर अधिक समय बिताने से परेशानी हो रही है। दोनों तरह के मरीजों की आंखों में जलन, कम दिखना, दर्द, सूखापन व धुंधला दिखने की शिकायत आम है। सर गंगाराम अस्पताल के नेत्र रोग विभाग के प्रमुख डॉ. एके ग्रोवर के मुताबिक, सबसे ज्यादा दिक्कत बच्चों में है। नॉन कोविड की परेशानी
डॉ. ग्रोवर बताते हैं कि कोरोना से बचने के लिए लंबे समय से लोग घरों में सिमटे हुए हैं। बड़ों को अपने ऑफिस का काम घर से करना पड़ रहा है वहीं बच्चों की क्लास भी ऑनलाइन चल रही हैं। सब कुुछ स्क्रीन पर हो रहा है। इससे आंखों में कमजोरी और कम दिखाई देने के लक्षण पैदा हुए हैं। डॉ. ग्रोवर ने कहा कि इन दिनों कंप्यूटर विजन सिंड्रोम भी देखा जा रहा है। वहीं फोर्टिस अस्पताल की डॉ. अनिता सेठी ने बताया कि लैपटॉप व मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली तरंगें आंखों पर बुरा असर डाल रही हैं। खासकर जो लोग दिन भर कंप्यूटर पर काम करते हैं उन्हें यह दिक्कत हो रही है। इसमें आंखों व सर में दर्द होता है, आंखें सूख जाती हैं।

संक्रमण से स्वस्थ हुए लोगों में भी यही लक्षण
कोरोना से स्वस्थ हुए कई लोगों को भी ऐसी समस्याएं हो रही हैं। राजीव गांधी अस्पताल के पोस्ट कोविड क्लीनिक में तैनात एक डॉक्टर ने बताया कि ज्यादातर मरीजों को सिरदर्द की शिकायत होती है। ऐसे मरीजों को न्यूरो और नेत्र रोग विशेषज्ञ के पास भेजा जाता है। कई बार जांच में पता चलता है कि मरीज की आंख में कमजोरी की वजह से सिरदर्द हो रहा है। इसकी एक वजह तो कोविड से शरीर के हर अंग को पहुंचा नुकसान है। वहीं, ज्यादा स्टेरॉयड लेने से भी आंखों पर बुरा असर पड़ा है।

बच्चों में दिक्कत ज्यादा
राजधानी के अस्पतालों की ओपीडी के नेत्र रोग विभाग में जो लोग इलाज के लिए आ रहे हैं, उनमें 60 फीसदी बच्चे हैं। जीटीबी अस्पताल के डॉ. विजय प्रताप ने बताया कि ऑनलाइन कक्षा हो या ऑफिस का काम, इसकी वजह से आई स्ट्रेन, चश्मे का नंबर बढ़ना जैसी समस्याएं हो रही हैं। इन दिनों स्कूली बच्चे में मायोपिया यानी चश्मे के माइनस नंबर लग रहे हैं। इसमें बच्चे की दूर की नजर धुंधली हो जाती है। चूंकि ज्यादातर बच्चे अभी बाहर नहीं निकल रहे हैं तो उन्हें इसका पता भी नहीं चल पाता है। इसलिए अभिभावक की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों की परेशानी पर गौर करें। अगर दिक्कत है तो तुरंत इलाज कराएं, क्योंकि इलाज में देरी से बीमारी बढ़ सकती है।

ऐसे करें आंखों की देखभाल

  • 10-12 घंटे इलेक्ट्रॉनिक चीजों (स्मार्ट फोन, लैपटॉप) को देखने से आंखों को नुकसान पहुंच रहा है। काम के बीच में ब्रेक लेते रहें।
  • फोन या लैपटॉप की ब्राइटनेस ज्यादा न बढ़ाएं
  • ज्यादा परेशानी होने पर आईड्रोप का प्रयोग कर सकते हैं
  • आंखों में जलन या दर्द है तो बाहर निकलते समय धूप का चश्मा लगा सकते हैं

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